मोंगरकशा तालाब का अद्भुत चमत्कार (1978) | बाबा जुमदेवजी की पादुकाओं की दिव्य महिमा

मोंगरकशा तालाब का अद्भुत चमत्कार (1978) | बाबा जुमदेवजी की पादुकाओं की दिव्य महिमा

मोंगरकशा तालाब का अद्भुत चमत्कार (1978) | बाबा जुमदेवजी की पादुकाओं की दिव्य महिमा

Table of Contents


प्रस्तावना

सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग—हर युग में परमेश्वर विभिन्न रूपों में प्रकट होते आए हैं। सतयुग की कथाएँ हम पुराणों में, रामायण और महाभारत में पढ़ते हैं। इन कथाओं को पढ़ते या सुनते समय हमारे मन में अक्सर यह प्रश्न उठता है—
“क्या आज के समय में भी ऐसी घटनाएँ घटती हैं?”

इसका उत्तर है—हाँ।
परमेश्वर आज भी उपस्थित है, केवल उसका रूप बदल गया है।

रामायण में उल्लेख मिलता है कि जब श्रीराम चौदह वर्ष के वनवास पर गए थे, तब भरत ने श्रीराम की पादुकाओं को राजसिंहासन पर स्थापित कर उनके नाम से राज्य का संचालन किया। इसका कारण यह था कि श्रीराम सत्य, मर्यादा और धर्म के प्रतीक थे, और वही दिव्यता उनकी पादुकाओं में भी विद्यमान थी।

उसी परंपरा का साक्षात्कार कलियुग में महानत्यागी बाबा जुमदेवजी की पादुकाओं के रूप में हुआ—और उसका जीवंत प्रमाण है मोंगरकशा तालाब की अद्भुत घटना


🌿 मानव जागृति का दौरा: सेवाभाव से अध्यात्म की ओर

अप्रैल 1978 का समय महानत्यागी बाबा जुमदेवजी के मानव जागृति कार्य में एक महत्वपूर्ण चरण सिद्ध हुआ। इस काल में बाबा, हमेशा की तरह, कुछ चयनित सेवकों को साथ लेकर गाँव-गाँव भ्रमण पर निकले थे। इस यात्रा का उद्देश्य किसी प्रकार का दिखावा, प्रसिद्धि या आडंबर नहीं था, बल्कि सामान्य मानव के जीवन में आध्यात्मिक जागृति उत्पन्न करना ही था।

बाबा का मार्गदर्शन सदैव एक ही दृढ़ विचार पर आधारित रहता था—
परमात्मा एक है, और मानव को सत्य, मर्यादा एवं प्रेम के मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।
इसी सिद्धांत के आधार पर बाबा लोगों को अंधविश्वास, व्यसन, द्वेष, हिंसा और छल-कपट से दूर रहने का संदेश देते थे। उनका जोर बाहरी कर्मकांडों से अधिक अंतर्मन की शुद्धता पर होता था।

1 अप्रैल 1978 को महानत्यागी बाबा जुमदेवजी नागपुर से सेवकों के साथ रामटेक मार्ग से भंडारबोडी पहुँचे। वहाँ स्थित परमात्मा एक सेवक दुग्ध उत्पादक सहकारी संस्था में बाबा ने भगवत्कार्य पर विस्तार से मार्गदर्शन किया। इस मार्गदर्शन में मानव जन्म का महत्व, सत्य आचरण का मूल्य, संयम, सेवा और सादगीपूर्ण जीवन पर गहन विचार प्रस्तुत किए गए। बाबा के शब्द सरल थे, किंतु उनके पीछे छिपा अर्थ अत्यंत गहरा था, जो सीधे हृदय को स्पर्श करता था।

भंडारबोडी में हुए इस मार्गदर्शन के बाद अगले कुछ दिनों में बाबा का दौरा कांद्री, पंचाळा और मंगरली जैसे गाँवों में हुआ। इस यात्रा में नागपुर के साथ-साथ लोहारा, शिवनी, भंडारबोडी, सालईमेटा, पंचाळा और मांद्री गाँवों के अनेक सेवक सहभागी हुए थे। प्रत्येक गाँव में बाबा के आगमन से वातावरण में स्वतः ही शांति और अनुशासन का भाव उत्पन्न हो जाता था। लोग बाबा को केवल एक संत के रूप में नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाले मार्गदर्शक के रूप में देखने लगे थे।

इस पूरे दौरे में कहीं भी भव्य सभाएँ, मंच या औपचारिक कार्यक्रम नहीं थे। बाबा जुमदेवजी जहाँ भी जाते, वहाँ सेवक और गाँववाले एकत्र होते और भगवत्कार्य पर चर्चा होती। बाबा के मार्गदर्शन को सुनकर अनेक सेवक और ग्रामवासी मानवधर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित होते। इसी सरल और शांत वातावरण में मानव जागृति का कार्य निरंतर आगे बढ़ रहा था।

यह संपूर्ण यात्रा सेवाभाव से अध्यात्म की ओर ले जाने वाला एक जीवंत प्रवास थी। आगे चलकर इसी यात्रा के दौरान घटित हुई मोंगरकशा तालाब की घटना इस दौरे की सबसे विलक्षण और दैवी अनुभूति सिद्ध हुई।


🌳 मंगरली गाँव: सादगी और श्रद्धा की भूमि

मंगरली गाँव घने जंगलों के बीच स्थित एक छोटा-सा गाँव था। इस गाँव में केवल 15–20 घर थे और पूरा वातावरण शांत तथा प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर था। इस गाँव में इस मार्ग से जुड़े दो सेवक रहते थे। उनमें से एक सेवक बाहर गाँव में विवाह के लिए गया हुआ था, इसलिए महानत्यागी बाबा जुमदेवजी का ठहराव दूसरे सेवक के घर पर हुआ।

जिस सेवक के घर बाबा ठहरे थे, वहाँ उसका एक वृद्ध मामा भी रहता था। उस वृद्ध को पिछले पंद्रह दिनों से लगातार तेज़ बुखार आ रहा था। बुखार के कारण उसकी स्थिति अत्यंत कमजोर हो गई थी। गाँव और आसपास के स्थानों पर कई डॉक्टरों को दिखाने के बाद भी दवाइयों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। इस कारण घर के लोग बहुत चिंतित थे और उसकी तबीयत को लेकर निराशा का माहौल बन गया था।

मंगरली गाँव में बाबा के दौरे के दौरान भगवत्कार्य की चर्चा और बैठक आयोजित हुई। उस बैठक में बाबा जुमदेवजी ने मानव जागृति पर मार्गदर्शन किया। सेवक और गाँव के लोग शांत भाव से बाबा के वचनों को सुन रहे थे। बाबा के मार्गदर्शन और सेवकों की श्रद्धा के कारण पूरा वातावरण भक्तिमय और गंभीर हो गया था। उस साधारण से घर और छोटे-से गाँव में भी आध्यात्मिक चेतना का अनुभव हो रहा था।

इसी शांत, सरल और श्रद्धा से भरे वातावरण में आगे वह घटना घटी, जो परमेश्वरी कृपा का प्रत्यक्ष प्रमाण बनी।


🍽️ एक साधारण प्रसंग, लेकिन बड़ा चमत्कार

भगवत्कार्य की चर्चा और बाबा जुमदेवजी का मार्गदर्शन समाप्त होने के बाद सभी सेवक भोजन के लिए बैठ गए। साथ आई हुई महिलाओं ने प्रेम और अपनत्व के साथ पंगत परोसी। सभी शांत भाव से भोजन कर रहे थे। उसी समय उस घर के वृद्ध मामा भी बाबा की आज्ञा से पंगत में आकर बैठ गए। कई दिनों से बीमारी के कारण उन्होंने ढंग से भोजन नहीं किया था, फिर भी बाबा की उपस्थिति में वे भोजन के लिए बैठे।

भोजन समाप्त होने के बाद वह वृद्ध पुनः बाबा के पास आया। अत्यंत विनम्रता और कृतज्ञता के भाव से उसने बाबा से कहा—

“बाबा, मुझे पिछले पंद्रह दिनों से लगातार तेज़ बुखार था। उस दौरान मैं भोजन भी नहीं कर पा रहा था। लेकिन आज आपके आगमन के बाद मेरा बुखार उतर गया और आज मैंने पहली बार पेट भरकर भोजन किया।”

उसके इन शब्दों से उसका आनंद और आश्चर्य स्पष्ट झलक रहा था। इस प्रसंग को देखकर वहाँ उपस्थित सभी सेवकों को भी संतोष और आश्चर्य की अनुभूति हुई। इस साधारण लेकिन प्रभावशाली घटना से एक बात स्पष्ट हो गई—

परमेश्वरी कृपा केवल सेवकों तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह सभी पर समान रूप से प्राप्त होती है।


🌲 वनभोजन का प्रस्ताव और मोंगरकशा तालाब

5 अप्रैल 1978 की सुबह सेवक शेरकी ने महानत्यागी बाबा जुमदेवजी के सामने एक विनम्र प्रस्ताव रखा। उन्होंने बाबा से कहा कि मंगरली गाँव से लगभग दस मील की दूरी पर मोंगरकशा तालाब नाम का एक ऐतिहासिक और प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर तालाब स्थित है। चारों ओर घने जंगलों से घिरा हुआ मोंगरकशा तालाब अत्यंत सुंदर है और सभी सेवकों के साथ वहाँ वनभोजन के लिए जाना उचित रहेगा।

सेवक की इस विनंती को स्वीकार करते हुए बाबा जुमदेवजी ने अपनी सहमति दी। बाबा की अनुमति मिलते ही स्त्री-पुरुष मिलाकर लगभग साठ सेवक मोंगरकशा तालाब जाने की तैयारी में लग गए। सभी ने चाय-नाश्ता किया और आवश्यक सामग्री एकत्र करने लगे, ताकि वनभोजन की व्यवस्था ठीक प्रकार से हो सके।

सामान ले जाने के लिए केवल एक ही बैलगाड़ी उपलब्ध थी। लेकिन उस बैलगाड़ी में जुता हुआ एक बैल बहुत अधिक वृद्ध था। सेवकों के बीच यह चर्चा थी कि वह बैल जुते जाने के बाद अक्सर बैठ जाता है और एक बार बैठ जाने पर फिर उठता नहीं। इसलिए कुछ सेवकों के मन में यह चिंता उत्पन्न हुई कि मोंगरकशा तालाब तक का सफ़र सुरक्षित होगा या नहीं।

सेवकों ने यह बात बाबा जुमदेवजी के संज्ञान में लाई। पूरी स्थिति को शांतिपूर्वक सुनने के बाद बाबा ने अत्यंत दृढ़ और विश्वासपूर्ण शब्दों में कहा—

“उसी बैल को गाड़ी में जोतो। आगे क्या होगा, वह परमेश्वर देखेगा।”

बाबा के इन शब्दों पर पूर्ण विश्वास रखते हुए सेवकों ने उसी वृद्ध बैल को बैलगाड़ी में जोत दिया। यात्रा प्रारंभ हुई और मोंगरकशा तालाब की ओर जाते समय सभी के लिए आश्चर्य का क्षण तब आया, जब वह बैल पूरे रास्ते में एक बार भी बैठा नहीं। उल्टा, वह अपने साथ के दूसरे बैल की तुलना में अधिक जोश और गति से चलता रहा। इस अनुभव को देखकर सेवकों के मन में बाबा के वचनों के प्रति श्रद्धा और भी अधिक दृढ़ हो गई।


🏞️ मोंगरकशा तालाब: प्राकृतिक सौंदर्य और चेतावनी

मोंगरकशा तालाब भंडारा ज़िले के घने जंगलों के बीच स्थित एक विशाल और ऐतिहासिक तालाब है। चारों ओर से जंगलों से घिरा हुआ मोंगरकशा तालाब देखने में जितना सुंदर लगता है, उतना ही गहरा और विस्तृत होने के कारण वह खतरनाक भी है। तालाब के मध्य भाग में पानी अत्यंत गहरा है और कुछ स्थानों पर जाल फैले हुए हैं, ऐसा स्थानीय लोग बताते थे।

मोंगरकशा तालाब के पास वन विभाग का एक चौकीदार उपस्थित था। उसने तालाब की स्थिति को भली-भांति जानते हुए सेवकों को स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी। वह बोला—

“इस मोंगरकशा तालाब में जो भी अंदर जाता है, वह वापस नहीं आता। पानी बहुत गहरा है और भीतर जाल फैले हुए हैं। यदि पैर जाल में फँस जाए, तो ऊपर आना असंभव हो जाता है।”

इस चेतावनी को सुनकर कुछ सेवक सतर्क हो गए। फिर भी बाबा जुमदेवजी ने पूरी स्थिति पर विचार करते हुए निर्णय लिया। उन्होंने सेवकों को मोंगरकशा तालाब के किनारे ही स्नान करने की अनुमति दी, ताकि किसी प्रकार का खतरा उत्पन्न न हो। बाबा का उद्देश्य यही था कि सभी सेवक पूरी सावधानी के साथ तालाब के किनारे रहकर ही स्नान करें।

बाबा की इस स्पष्ट निर्देशानुसार सभी सेवकों ने सावधानी बरतते हुए तालाब के किनारे ही स्नान करने का निश्चय किया


🚣 नाव से शुरू हुआ संकट का क्षण

मोंगरकशा तालाब में एक पुरानी जोड़नाव पानी में उतारी गई। कुछ सेवक उस नाव में बैठ गए, जबकि अन्य सेवक तालाब के किनारे खड़े होकर सब कुछ देख रहे थे। जिन्हें तैरना नहीं आता था, ऐसे दिवाणजी ने नाव चलाने का प्रयास किया। लेकिन नाव चलाने का पर्याप्त अनुभव न होने के कारण नाव एक ओर झुक गई।

क्षण भर में ही मोंगरकशा तालाब का पानी नाव में भरने लगा। नाव का संतुलन बिगड़ते ही सेवक एक-एक करके पानी में गिरने लगे। जिन्हें तैरना आता था, वे तुरंत बाहर निकलने का प्रयास करने लगे, लेकिन कुछ सेवकों के लिए यह क्षण अत्यंत भयावह सिद्ध हुआ।

तालाब के किनारे खड़े सेवकों के मुँह से एक ही चीख निकल पड़ी—

“नाव डूब गई!”

यह आवाज़ दूर तक फैल गई और चारों ओर घबराहट का माहौल बन गया। इसी अफरा-तफरी के बीच वहाँ उपस्थित एक सेविका के दृढ़ और विश्वासपूर्ण शब्द सभी के कानों में पड़े—

“बाबा के रहते मोंगरकशा तालाब में नाव कैसे डूब सकती है?”

इन शब्दों में छिपी श्रद्धा और आत्मविश्वास ही इस संकटपूर्ण प्रसंग का केंद्रबिंदु बन गया। बाबा की कृपा पर यह अटूट विश्वास आगे घटित होने वाली दैवी घटना की भूमिका सिद्ध हुआ।


👣 पादुकाएँ और परमेश्वरी उपस्थिति

इसी अफरा-तफरी के बीच बाबा जुमदेवजी स्नान पूर्ण कर अपने विश्राम स्थल की ओर जाने लगे। चलते समय उनके पैरों में कंकड़ और काँटे चुभने लगे। तभी बाबा को ध्यान आया कि उन्होंने पादुकाएँ पहनी ही नहीं हैं और वे मोंगरकशा तालाब के किनारे ही रह गई हैं। यह समझते ही बाबा तुरंत वापस तालाब की ओर मुड़ गए।

जब बाबा वापस पहुँचे, तो उनके सामने जो दृश्य था, वह अत्यंत अद्भुत और आश्चर्य से भर देने वाला था। मोंगरकशा तालाब में वह पुरानी जोड़नाव पूरी तरह पानी से भरी हुई थी, फिर भी वह डूबी नहीं थी। पूरी नाव पानी में होते हुए भी तालाब की सतह पर तैर रही थी। उसी नाव में नागपुर के सेवक श्री लक्ष्मणरावजी उराडे दोनों पैरों को फैलाकर खड़े थे। उन्हें तैरना नहीं आता था, फिर भी वे पूरी तरह जीवित और सुरक्षित थे।

बाबा के आसपास खड़े सेवकों के लिए यह दृश्य अविश्वसनीय था। बाबा ने सेवकों से पूछा—

“यह तुम लोगों ने क्या किया? बार-बार समझाने पर भी तुमने बाबा की बात नहीं मानी।”

इसके बाद बाबा ने पूरी घटना की विस्तार से पूछताछ की—
नाव में कितने सेवक थे,
कितने लोग तैरकर बाहर निकल आए,
और क्या कोई अंदर फँसा हुआ रह गया है।

जाँच करने पर यह स्पष्ट हुआ कि अधिकांश सेवक बाहर आ चुके थे, लेकिन गोपीचंद तुपट नामक सेवक को तैरना न आने के कारण वह पानी के भीतर फँसा हुआ था। उसे बचाने के लिए सेवक संपत शेरकी स्वयं पानी में उतरे और उसे सुरक्षित किनारे तक ले आए।

इसके बाद बाबा ने मांद्री गाँव के सेवक कचरू को आदेश दिया—

“पानी से भरी नाव की रस्सी पकड़ो और उसे किनारे तक खींचकर लाओ।”

बाबा के आदेश का पालन करते हुए उस सेवक ने तैरते हुए नाव की रस्सी पकड़ी और उसे मोंगरकशा तालाब के किनारे तक ले आया। उसी समय श्री उराडे भी सुरक्षित रूप से किनारे पहुँच गए।

नाव पूरी तरह पानी से भरी होने के बावजूद उसका न डूबना, सभी के लिए एक स्पष्ट संकेत था कि वहाँ कोई अदृश्य दैवी शक्ति कार्यरत थी। बाबा की अनुपस्थिति में भी उनकी पादुकाओं के रूप में परमेश्वरी उपस्थिति मोंगरकशा तालाब के किनारे विद्यमान थी। उसी दैवी शक्ति के कारण सभी सेवक इस भयानक संकट से सकुशल बाहर आ सके।


🙏 सेवकों के अनुभव: जीवदान की साक्ष

इस भयावह प्रसंग के बाद मोंगरकशा तालाब के किनारे एकत्र हुए सेवकों ने अपने-अपने अनुभव साझा किए। नाव में खड़े रहते समय मृत्यु बिल्कुल सामने खड़ी होने का एहसास हर किसी के मन में था। पानी से भरी नाव से बच निकलने की कोई भी आशा शेष नहीं बची थी। उस क्षण सभी को स्पष्ट रूप से लग रहा था कि अब कोई भी मानवीय उपाय काम आने वाला नहीं है।

ऐसे समय में सेवकों ने केवल एक ही सहारा लिया—भगवंत का नाम
मन में भय था, लेकिन उसी भय के साथ अटूट श्रद्धा भी थी। कुछ सेवकों ने अपने अंतःकरण से प्रार्थना की। जीवन बचेगा या नहीं, इसका कोई भरोसा न होते हुए भी उन्होंने पूर्ण विश्वास के साथ परमेश्वर का स्मरण किया।

सेवकों ने बताया कि जैसे ही प्रार्थना की गई, वैसा लगा मानो कोई अदृश्य शक्ति सक्रिय हो गई हो। नाव पूरी तरह पानी से भरी होने के बावजूद डूब नहीं रही थी। जहाँ सब कुछ समाप्त हो जाएगा, ऐसा लग रहा था, वहीं आश्चर्यजनक रूप से जीवदान प्राप्त हुआ। यह अनुभव शब्दों में व्यक्त करना अत्यंत कठिन था।

इस घटना के बाद सभी सेवकों के मन में एक ही बात दृढ़ता से स्थापित हो गई—
बाबा की पादुकाओं के रूप में स्वयं परमेश्वर मोंगरकशा तालाब के किनारे उपस्थित थे।
उसी दैवी उपस्थिति के कारण यह बड़ा अनर्थ टल गया और सभी सेवक सुरक्षित रूप से बाहर निकल सके।

यह प्रसंग सेवकों के लिए मात्र एक दुर्घटना नहीं था, बल्कि परमेश्वरी कृपा का जीवंत साक्षात्कार बन गया।


🔍 चौकीदार का कथन

इस पूरी घटना का साक्षी वन विभाग का चौकीदार भी वहाँ उपस्थित था। मोंगरकशा तालाब में घटित दृश्य को देखकर वह अत्यंत आश्चर्यचकित हो गया। उसने सेवकों से कहा कि इस तालाब में आज तक जो भी अंदर गया है, वह वापस नहीं आया। पानी बहुत गहरा है और भीतर जाल फैले हुए हैं, इसलिए यहाँ कोई भी बच नहीं पाता। इसी कारण इस तालाब में मछली पकड़ने के लिए भी कोई अंदर उतरने का साहस नहीं करता।

इसके बावजूद सभी सेवकों को सुरक्षित बाहर आते देखकर चौकीदार ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह सब आपके गुरु के साथ होने के कारण ही संभव हो सका है। उसने यह भी कहा कि आप सभी पर परमेश्वर की कृपा है, और उसी कृपा के कारण मोंगरकशा तालाब में घटित यह बड़ा संकट बिना किसी जीवित हानि के टल गया। यह उसका दृढ़ मत था कि इस घटना के पीछे कोई साधारण कारण नहीं, बल्कि दैवी शक्ति का हस्तक्षेप है।


🔔 अंतिम संदेश

मोंगरकशा तालाब में घटित इस अद्भुत घटना के बाद सभी सेवकों के मन में भय के स्थान पर गहरी कृतज्ञता की भावना उत्पन्न हो गई। जीवनदान मिलने का अनुभव होते ही सभी सेवक बाबा जुमदेवजी के समक्ष नतमस्तक हो गए। इस प्रसंग से सभी को यह स्पष्ट रूप से समझ में आ गया कि बाबा के शब्दों की अवहेलना करने के कारण ही यह संकट उत्पन्न हुआ था।

उसी क्षण सभी सेवकों ने एकत्र होकर बाबा के समक्ष यह संकल्प लिया—

“आगे से हम सदैव बाबा के वचनों का पालन करेंगे और उनकी आज्ञा का कभी उल्लंघन नहीं करेंगे।”

सेवकों के हृदय में उत्पन्न पश्चाताप और अटूट श्रद्धा को देखकर बाबा ने उन्हें क्षमा कर दिया। अत्यंत शांत और दृढ़ स्वर में बाबा ने सेवकों को यह महत्वपूर्ण संदेश दिया—

“परमेश्वर सर्वत्र उपस्थित है। कभी वह देह के रूप में प्रकट होता है, तो कभी पादुकाओं के रूप में।”

इन वचनों के माध्यम से बाबा ने एक गहन सत्य को स्पष्ट किया—
परमेश्वर की उपस्थिति केवल किसी व्यक्ति तक सीमित नहीं होती, बल्कि जहाँ श्रद्धा और आज्ञापालन होता है, वहाँ वह निरंतर सक्रिय रहता है। मोंगरकशा तालाब की यह घटना सेवकों के लिए जीवनभर स्मरण में रहने वाली, श्रद्धा को और अधिक दृढ़ करने वाली तथा मानवधर्म के मार्ग को दृढ़ता से अपनाने की प्रेरणा देने वाली सिद्ध हुई।


🌺 उपसंहार

मोंगरकशा तालाब में घटित यह घटना केवल एक चमत्कार के रूप में देखने तक सीमित नहीं है। यह श्रद्धा, आज्ञापालन और परमेश्वरी उपस्थिति का एक जीवंत अनुभव है। बाबा जुमदेवजी की प्रत्यक्ष अनुपस्थिति में भी उनकी पादुकाओं के रूप में परमेश्वर की उपस्थिति वहाँ विद्यमान थी—इसका यह स्पष्ट साक्षात्कार है।

इस घटना से एक गहन सत्य सामने आता है—
परमेश्वर केवल प्राचीन ग्रंथों या कथाओं तक सीमित नहीं है। आज भी, इस कलियुग में भी, वह विद्यमान है; किंतु उसकी अनुभूति के लिए श्रद्धा, विश्वास और पहचानने की दृष्टि आवश्यक है।

मोंगरकशा तालाब की यह घटना न केवल सेवकों के लिए, बल्कि प्रत्येक साधक के लिए एक स्पष्ट संदेश देती है—
जो सत्य, मर्यादा और आज्ञापालन के मार्ग पर चलता है, उसे परमेश्वर कभी अकेला नहीं छोड़ता।

🌸 भगवान बाबा हनुमानजी की जय 🌸
🌸 महानत्यागी बाबा जुमदेवजी की जय 🌸
🌸 परमात्मा एक 🌸


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