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✨ प्रस्तावना
समाज में साधु, महात्मा और तपस्वियों को बहुत सम्मान दिया जाता है। लेकिन हर साधु सच्चा ही हो, ऐसा जरूरी नहीं है। बाहरी वेश, जटाएँ, दाढ़ी या कफनी से कोई आध्यात्मिक नहीं बनता—यह सच्चाई कई लोगों को देर से समझ में आती है।
सन 1970 में घटी “ढोंगी साधु” की घटना महान त्यागी बाबा जुमदेवजी के जीवन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और समाज को जागरूक करने वाली घटना है। इस घटना से यह स्पष्ट रूप से समझ में आता है कि सच्चा अध्यात्म क्या है, ढोंग को कैसे पहचाना जाए और परमेश्वर वास्तव में कहाँ है।
🌍 उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका की यात्रा
1969 का वर्ष महान त्यागी बाबा जुमदेवजी के परिवार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुआ। उनके पुत्र महादेव ने नागपुर स्थित विश्वेश्वरय्या रीजनल कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग से बी.ई. की परीक्षा प्रथम मेरिट क्रमांक से उत्तीर्ण कर शैक्षणिक क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की थी। उनकी इस सफलता के कारण आगे की उच्च शिक्षा के लिए विदेश जाने का अवसर प्राप्त हुआ।
महादेव को अमेरिका की प्रतिष्ठित न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में मेटलर्जी और मटेरियल साइंस विषय में एम.एस. डिग्री के लिए प्रवेश मिला। उस समय विदेश में शिक्षा प्राप्त करना एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी और इसलिए परिवार में खुशी के साथ-साथ भावनात्मक माहौल भी बन गया था।
महादेव अमेरिका जा रहे थे, इसलिए उन्हें विदा करने के लिए महान त्यागी बाबा जुमदेवजी स्वयं दिल्ली गए। उनके साथ माता सौ. वाराणसीबाई, मौसी सौ. चंद्रभागाबाई निखारे, मामी सौ. गयाबाई बुरडे और महादेव के मित्र विठ्ठल राऊत भी उपस्थित थे। यह यात्रा केवल विदाई की नहीं थी, बल्कि परिवार की जिम्मेदारी, त्याग और भावनात्मक संबंधों को दर्शाने वाली थी।
दिल्ली पहुँचने के बाद कुछ दिन सभी लोग साथ रहे। महादेव को अमेरिका रवाना करने से पहले का यह समय सभी के लिए स्मरणीय बन गया। आगे इसी यात्रा के दौरान घटी घटनाओं ने महान त्यागी बाबा जुमदेवजी की निर्भीक विचारधारा और सच्चे अध्यात्म का स्पष्ट अनुभव कराया।
🚆 दिल्ली से ऋषिकेश: यात्रा की शुरुआत
दिल्ली में ठहराव के दौरान दो दिनों तक सभी ने ताजमहल, लाल किला, जंतर-मंतर जैसे ऐतिहासिक और दर्शनीय स्थलों का भ्रमण किया। इन स्थलों के माध्यम से भारत के समृद्ध इतिहास और सांस्कृतिक वैभव का अनुभव हो रहा था। परिवार के साथ बिताए गए ये पल महादेव के लिए भावनात्मक रूप से बहुत महत्वपूर्ण थे, क्योंकि आगे उसे विदेश में लंबे समय के लिए जाने की तैयारी करनी थी।
इसके बाद तय कार्यक्रम के अनुसार, रात की फ्लाइट से महादेव को अमेरिका रवाना करने के लिए दिल्ली के पालम एयरपोर्ट पर छोड़ा गया। बेटे को विदा करते समय बाबा जुमदेवजी और पूरा परिवार भावुक हो गया था, लेकिन साथ ही उसके उज्ज्वल भविष्य को लेकर संतोष और गर्व भी उनके चेहरों पर साफ झलक रहा था।
महादेव के अमेरिका चले जाने के बाद अगले दिन सभी ने मिलकर विचार किया कि दिल्ली के पास स्थित ऋषिकेश और हरिद्वार जैसे ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों का भ्रमण किया जाए। यह निर्णय किसी कर्मकांड के लिए नहीं था, बल्कि उन स्थानों को ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से देखने और समझने के लिए था।
तय योजना के अनुसार सभी लोग सुबह जल्दी ट्रेन से ऋषिकेश के लिए रवाना हुए। यह यात्रा केवल भौगोलिक बदलाव की नहीं थी, बल्कि आगे घटित होने वाली एक महत्वपूर्ण घटना की भूमिका थी। इसी यात्रा के दौरान महान त्यागी बाबा जुमदेवजी की निर्भीक विचारधारा और सच्चे अध्यात्म का साक्षात्कार सभी के सामने आने वाला था।
🛕 मंदिरों को लेकर बाबा की स्पष्ट भूमिका
ऋषिकेश की यात्रा की शुरुआत में ही महान त्यागी बाबा जुमदेवजी ने सभी सेवकों और परिवारजनों को एक अत्यंत स्पष्ट और दृढ़ निर्देश दिया। उन्होंने शांत लेकिन दृढ़ शब्दों में कहा—
“किसी भी मंदिर में नमस्कार नहीं करना है।”
यह सुनकर कुछ लोगों को आश्चर्य हुआ, क्योंकि ऋषिकेश और हरिद्वार परंपरागत रूप से धार्मिक तीर्थस्थल माने जाते हैं। लेकिन इसके पीछे बाबा की सोच पूरी तरह स्पष्ट थी। बाबा का कहना था कि ईश्वर निर्जीव पत्थर की मूर्ति में नहीं रहता, बल्कि वह हर जीव की आत्मा में निरंतर विद्यमान होता है। मनुष्य द्वारा बनाई गई मूर्ति कला, परंपरा या श्रद्धा का प्रतीक हो सकती है, लेकिन परमेश्वर उस निर्जीव मूर्ति में नहीं, बल्कि जीवित आत्मा में है।
बाबा हमेशा कहते थे कि यदि मनुष्य ने अपने भीतर स्थित परमेश्वर को नहीं पहचाना, तो केवल मंदिर जाकर नमस्कार करने से आध्यात्मिक अनुभूति नहीं होती। बाहरी कर्मकांड से अधिक उन्होंने अंतर्मन की शुद्धता, सत्य आचरण और आत्मबोध को ही सच्चा अध्यात्म माना। इसी कारण इस पूरे प्रवास में उन्होंने सभी को केवल ऐतिहासिक और स्थापत्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान देखने की सलाह दी, लेकिन किसी भी मंदिर में नमस्कार करने से मना किया।
यह बाबा की भूमिका केवल एक नियम नहीं थी, बल्कि सेवकों को आत्मा में बसे परमेश्वर की पहचान कराने का एक प्रयास थी। आगे इसी सोच के कारण ऋषिकेश–हरिद्वार की यात्रा में घटी घटना सच्चे अध्यात्म और ढोंग के बीच का अंतर स्पष्ट करने वाली सिद्ध हुई।
🤝 मारवाड़ी दंपति और मानव धर्म का संदेश
ऋषिकेश में ऐतिहासिक स्थलों का भ्रमण करते समय महान त्यागी बाबा जुमदेवजी और उनके साथ मौजूद लोगों की गुजरात से आए एक वृद्ध मारवाड़ी दंपति से मुलाकात हुई। यह दंपति भी तीर्थदर्शन के लिए आया था। बातचीत के दौरान एक-दूसरे से परिचय बढ़ा और यात्रा के समय उनका साथ बना रहा।
मारवाड़ी समाज में एक पुरानी परंपरा है। यदि तीर्थयात्रा के दौरान किसी स्त्री के साथ उसका भाई न हो, तो वह किसी योग्य उम्र के पुरुष को अपना भाई मान लेती है और उसे उपहार देकर धार्मिक रीति पूरी करती है। इस परंपरा के पीछे पवित्र भावना और भावनात्मक संबंध बनाए रखने का उद्देश्य होता है, ऐसा उनका विश्वास है।
उस वृद्ध स्त्री ने आदरपूर्वक बाबा की ओर देखा और उन्हें अपना भाई मानकर कुछ वस्तुएँ भेंट कीं। परंपरा के अनुसार उसने बाबा की पूजा भी की। बाबा ने उसकी भावना स्वीकार की, लेकिन इसके बाद उन्होंने उस दंपति को अत्यंत सरल और स्पष्ट शब्दों में परमेश्वर के बारे में मार्गदर्शन किया।
बाबा ने उन्हें बताया कि परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए केवल बाहरी विधि या औपचारिक पूजा पर्याप्त नहीं है। मनुष्य को अपने जीवन में सत्य, मर्यादा और प्रेम को अपनाना चाहिए। मानव-मानव के बीच भेदभाव न करते हुए एक-दूसरे से प्रेम और अपनत्व से व्यवहार करना ही सच्चा मानव धर्म है। सभी मनुष्य परमेश्वर की ही संतान हैं, इसलिए यदि एकता की भावना उत्पन्न हो जाए तो समाज में शांति और संतुलन बना रहता है।
बाबा का यह मार्गदर्शन सुनकर उस मारवाड़ी दंपति पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने शांत मन से बाबा के विचार सुने और उनके शब्दों का सार समझा। इस प्रसंग से बाबा का मानव धर्म का संदेश केवल शब्दों तक सीमित न रहकर, व्यवहार में उतरता हुआ दिखाई दिया।
🚉 हरिद्वार प्रवास और तथाकथित तपस्वी
हरिद्वार जाने के लिए सभी लोग ट्रेन से यात्रा कर रहे थे। सभी एक ही डिब्बे में बैठे हुए थे। उसी डिब्बे के एक कोने में एक तथाकथित तपस्वी महात्मा बैठे थे। उनका पूरा वेश देखकर पहली नजर में ही ऐसा लगता था कि वे कोई बड़े साधक या ऋषि हैं। सिर पर बढ़ी हुई जटाएँ, पेट तक आई दाढ़ी, शरीर पर लाल रंग की कफनी, गले में रुद्राक्ष की माला, हाथ में लाठी और पास में रखा दानपात्र—इन सब कारणों से उनका तपस्वी स्वरूप और भी प्रभावशाली दिखाई दे रहा था।
यात्रा के दौरान बाबा और उस महात्मा की पहचान हुई। सामान्य बातचीत चल ही रही थी कि उस तपस्वी ने बाबा से एक सीधा सवाल पूछ लिया—
“क्या आपने मंदिर में नमस्कार किया?”
यह प्रश्न सुनते ही बाबा जुमदेवजी शांत भाव से मुस्कुराए और बिना किसी दिखावे के उन्होंने साफ उत्तर दिया। बाबा ने कहा कि उन्होंने किसी भी मंदिर में नमस्कार नहीं किया। क्योंकि मंदिरों में उन्हें केवल मनुष्य द्वारा बनाई गई निर्जीव मूर्तियाँ दिखाई दीं; लेकिन परमेश्वर कहीं दिखाई नहीं दिया।
बाबा ने आगे स्पष्ट किया कि पत्थर की मूर्ति में परमेश्वर नहीं रहता। परमेश्वर हर जीव की आत्मा में निरंतर वास करता है। इसलिए बाहरी रूप की पूजा या नमस्कार से अधिक आत्मिक सत्य को पहचानना जरूरी है। मंदिर में सिर झुकाने से अधिक, यदि मनुष्य अपने आचरण में सत्य, मर्यादा और प्रेम को अपनाए, तभी परमेश्वर प्रसन्न होता है—ऐसा बाबा का दृढ़ विश्वास था।
बाबा का यह निर्भीक और सीधा उत्तर सुनकर वह तथाकथित तपस्वी कुछ क्षण के लिए निरुत्तर हो गया। ट्रेन के उस डिब्बे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। बाबा के शब्दों में केवल विचार ही नहीं, बल्कि गहन आत्मानुभव झलक रहा था—यह उस प्रसंग से स्पष्ट रूप से महसूस हो रहा था।
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❓ बाबा का सीधा प्रश्न और ढोंग का पर्दाफाश
इसके बाद बाबा ने उस तपस्वी से एक अत्यंत सीधा और सोचने पर मजबूर करने वाला प्रश्न किया—
“तपस्या करते समय क्या परमेश्वर स्वयं तुम्हें भोजन की थाली लाकर देता है?”
यह प्रश्न सुनते ही वह तपस्वी पूरी तरह हतप्रभ रह गया। कुछ क्षणों तक वह कुछ भी बोल नहीं पाया। बाबा का यह प्रश्न केवल शब्दों का नहीं था, बल्कि उसकी पूरी तथाकथित साधना पर प्रकाश डालने वाला था। कुछ देर की खामोशी के बाद अंततः उस तपस्वी ने सत्य स्वीकार कर लिया।
उसने विनम्रता से सिर झुकाकर कहा कि ऐसी कोई बात वास्तव में कभी घटी ही नहीं। परमेश्वर कभी भी भोजन की थाली लेकर नहीं आया। लोगों में प्रचलित यह बात झूठी है—यह उसने स्वयं स्वीकार किया। आगे उसने बताया कि उनके आश्रम में दर्शन के लिए आने वाले लोगों से बड़ी रकम ली जाती थी और उन्हें “भगवान आपकी मनोकामना पूरी करेगा” ऐसा आशीर्वाद दिया जाता था।
उस तपस्वी ने साफ-साफ स्वीकार किया कि इस तरह तीस वर्षों में बहुत सारी संपत्ति इकट्ठी की, खूब पैसा कमाया; लेकिन इतने वर्षों की तथाकथित तपस्या के बाद भी उसे परमेश्वर का प्रत्यक्ष साक्षात्कार नहीं हुआ। बाहरी वेश, साधना और विधियों के बावजूद उसके भीतर परमेश्वर की अनुभूति नहीं थी—यह सच्चाई उसके शब्दों से स्पष्ट हो गई।
इस स्वीकारोक्ति से एक बात साफ सामने आई—
परमेश्वर का मार्ग ढोंग का नहीं, बल्कि सत्य का है।
बाहरी तपस्या से अधिक, अंतर्मन की ईमानदारी, सत्य और प्रेम ही परमेश्वर को प्रिय हैं।
🧘 सच्चा अध्यात्म बनाम ढोंगी साधुपन
इस क्षण उस तथाकथित तपस्वी के साधुपन का पूरी तरह पर्दाफाश हो गया। बाहरी वेश, जटाएँ, दाढ़ी, कफनी, रुद्राक्ष की माला और आश्रम—इन सबके पीछे छिपी असत्य की दीवार बाबा के एक ही प्रश्न से ढह गई। बाबा ने अत्यंत स्पष्ट शब्दों में कहा कि परमेश्वर वेश नहीं देखता, वह हृदय देखता है।
बाबा का कहना बिल्कुल स्पष्ट था—
“वेश से नहीं, सत्य से परमेश्वर मिलता है।”
केवल साधु होने का दिखावा करके, लोगों को भगवान के नाम पर डर दिखाकर या झूठे आश्वासन देकर पैसा इकट्ठा करना अध्यात्म नहीं है, बल्कि यह अध्यात्म का अपमान है। परमेश्वर को पत्थर, वस्त्र, दानपात्र या बाहरी साधनाएँ प्रिय नहीं हैं; उसे प्रिय हैं सत्य आचरण, श्रम, स्वावलंबन और निर्मल अंतःकरण।
बाबा ने स्पष्ट किया कि जो मनुष्य स्वयं मेहनत करता है, सत्य के साथ जीवन जीता है, किसी को ठगता नहीं और हर इंसान में परमेश्वर को देखता है—वही सच्चा साधक है। आत्मज्ञान का अर्थ है स्वयं को पहचानना, अपने कर्मों की जिम्मेदारी लेना और निर्भय होकर सत्य के मार्ग पर चलना।
इस प्रसंग के माध्यम से बाबा ने सेवकों और वहाँ उपस्थित सभी लोगों को एक महत्वपूर्ण संदेश दिया—
अध्यात्म का मतलब लोगों से अलग हो जाना नहीं है, बल्कि लोगों के बीच रहते हुए भी असत्य से दूर रहना है। परमेश्वर को पाने के लिए वेश बदलने की जरूरत नहीं, बल्कि विचार, आचरण और जीवनशैली बदलने की जरूरत है।
यह संवाद केवल उस तपस्वी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उस समय के ढोंगी साधुपन पर एक कठोर लेकिन सत्य का दर्पण बन गया। बाबा का यह उपदेश सेवकों के मन में गहराई से बैठ गया और सच्चे अध्यात्म की पहचान कराने वाला सिद्ध हुआ।
⚠️ अंधविश्वास, पैसा और समाज की ठगी
बाबा ने सेवकों को अत्यंत स्पष्ट शब्दों में बताया कि समाज में बढ़ता हुआ अंधविश्वास ही ढोंगी साधुओं को बढ़ावा देने का मुख्य कारण है। लोग सत्य की खोज करने के बजाय चमत्कार, वेश और डर के पीछे भागते हैं। निर्जीव पत्थर की मूर्ति को भगवान मानकर उस पर भोग चढ़ाए जाते हैं; लेकिन उसी मूर्ति के सामने खड़े जीवित मनुष्य की चेतन आत्मा में परमेश्वर है—यह पहचानने की दृष्टि लोगों में नहीं बची है।
इसी अंधविश्वास का फायदा उठाकर कई ढोंगी साधु भगवान के नाम पर लोगों को डराते हैं, ठगते हैं और अपार संपत्ति इकट्ठा करते हैं। बाबा के अनुसार, जहाँ सत्य लुप्त होता है, वहाँ असत्य, अधर्म और भ्रष्टाचार अपने आप बढ़ता है। यदि समाज बिना सोचे-समझे केवल परंपरा के नाम पर ऐसे ढोंग पर विश्वास करता रहा, तो उसके परिणाम पूरे समाज को भुगतने पड़ते हैं।
बाबा ने दृढ़ता से कहा कि परमेश्वर न तो पैसे में है, न दानपात्र में और न ही बाहरी आडंबर में। वह केवल सत्य आचरण में, श्रम में और निर्मल अंतःकरण में ही टिकता है। अंधविश्वास बढ़ने पर मनुष्य सोचने की शक्ति खो देता है और तभी समाज की ठगी शुरू हो जाती है। इसी कारण बाबा का पूरा मार्गदर्शन अंधविश्वास के विरुद्ध और सत्य को जाग्रत करने के लिए था।
📜 बाबा का उपदेश: आत्मा में बसे परमेश्वर
बाबा जुमदेवजी अपने मार्गदर्शन में हमेशा एक ही मूल सत्य पर जोर देते हैं—
परमेश्वर हर मनुष्य की आत्मा में वास करता है। उसे बाहर कहीं खोजने की जरूरत नहीं है, क्योंकि सत्य, प्रेम और मर्यादा से जीने वाली हर आत्मा में वह सदैव उपस्थित है।
बाबा का दृढ़ मत है कि सत्य ही परमेश्वर को प्रिय है। असत्य, धोखा, दिखावा या आडंबर में परमेश्वर नहीं टिकता। इसलिए उन्होंने गुरु-पूजा से अधिक आत्म-पूजा को महत्व दिया। किसी व्यक्ति, गुरु या संत को भगवान मानकर उसकी पूजा करने की बजाय, अपनी ही आत्मा में बसे परमेश्वर को पहचानना और उसी के अनुसार आचरण करना ही सच्चा धर्म है—ऐसा बाबा कहते हैं।
इसी कारण बाबा कभी भी किसी को अपने पैरों पर सिर रखने नहीं देते। हर व्यक्ति की आत्मा में परमेश्वर है, इसलिए किसी को भी स्वयं के सामने झुकने की आवश्यकता नहीं है—यह वे स्पष्ट करते हैं। साथ ही बाबा स्वयं कभी भी भिक्षा नहीं मांगते और अपने सेवकों को भी भिक्षा मांगने नहीं देते। श्रम और स्वावलंबन ही सच्चा धर्म है—यह उपदेश वे अपने आचरण से दिखाते हैं।
बाबा के अनुसार, जो मनुष्य स्वयं मेहनत करके जीवन जीता है, सत्य से व्यवहार करता है और दूसरों की आत्मा में बसे परमेश्वर को पहचानता है—वही सच्चा साधक है। इसी जीवन-पद्धति से आत्मज्ञान, आत्म अनुभूति और परमेश्वर की सच्ची पहचान होती है। बाबा के ये उपदेश केवल शब्दों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनके पूरे जीवन से निरंतर प्रकट होते रहते हैं।
🔔 अंतिम संदेश
इस घटना के बाद सेवकों को एक अत्यंत महत्वपूर्ण सत्य स्पष्ट रूप से समझ में आ गया—
बाहरी वेश, दाढ़ी, जटाएँ या कफनी देखकर किसी को भी भगवान नहीं मानना चाहिए। परमेश्वर की पहचान कपड़ों में, आडंबर में या दिखावे में नहीं होती, बल्कि मनुष्य के आचरण और जीवनशैली में दिखाई देती है।
बाबा के मार्गदर्शन से सेवकों को यह समझ में आया कि जो मनुष्य सत्य से जीवन जीता है, मर्यादा का पालन करता है और प्रेम से व्यवहार करता है—वही वास्तव में आध्यात्मिक है। अध्यात्म का अर्थ समाज से दूर भागना नहीं, बल्कि समाज में रहते हुए भी असत्य, लोभ और धोखे से दूर रहना है।
इस प्रसंग से सेवकों ने आत्मपरीक्षण किया और बाबा के उपदेश का वास्तविक अर्थ समझा—
यदि परमेश्वर को खोजना है, तो वह वेश में नहीं; वह सत्य आचरण में है।
यह संदेश उनके जीवन को दिशा देने वाला और सच्चे अध्यात्म की ओर ले जाने वाला सिद्ध हुआ।
🌺 उपसंहार
“ढोंगी साधु” की यह घटना समाज को आईना दिखाने वाली है।
यह हमें स्पष्ट रूप से बताती है कि परमेश्वर न मंदिर में है, न वेश में—
वह हर मनुष्य की आत्मा में है।
महान त्यागी बाबा जुमदेवजी के निर्भीक और सत्यनिष्ठ विचारों से सच्चा अध्यात्म वास्तव में क्या है, यह इस घटना से स्पष्ट हो जाता है। बाहरी आडंबर, साधुपन का दिखावा और भगवान के नाम पर होने वाली ठगी का उन्होंने दृढ़ शब्दों में विरोध किया। सत्य, श्रम, स्वावलंबन और आत्मज्ञान को ही उन्होंने अध्यात्म की सच्ची पहचान माना।
यह घटना केवल उस समय तक सीमित नहीं है। आज के समाज में भी, जहाँ अंधविश्वास और ढोंग आज भी बड़े पैमाने पर दिखाई देता है, वहाँ बाबा के विचार और भी अधिक मार्गदर्शक बन जाते हैं। हर मनुष्य को अपनी आत्मा में बसे परमेश्वर को पहचानकर सत्य, मर्यादा और प्रेम के मार्ग पर चलना चाहिए—यह संदेश इस घटना से स्पष्ट रूप से सामने आता है।
यह कहानी केवल एक घटना की नहीं, बल्कि समाज को जागरूक करने वाली, सोचने पर मजबूर करने वाली और सच्चे अध्यात्म की ओर ले जाने वाली है।
संदर्भ:
इस लेख की जानकारी “मानव धर्म – परिचय” पुस्तक पर आधारित है, जो परमपूज्य परमात्मा एक सेवक मंडल, वर्धमान नगर, नागपुर द्वारा प्रकाशित साहित्य पर आधारित है।
🌸 भगवान बाबा हनुमानजी की जय 🌸
🌸 महानत्यागी बाबा जुमदेवजी की जय 🌸
🌸 परमात्मा एक 🌸




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